सूनी राहों पर ढूंडा तुम्हे,
शांत चौराहों पर ढूंडा तुम्हे,
पेड़-पोधो से पूछा पता,
कंकड़-दीवारों से किया पता,
धूल भरे पत्ते से जानना चाहा,
सड़क के खम्बे से जानना चाहा,
फिर उस मोड़ से आइ सिसक भरी आहट,
मिटा गई तुम्हे पाने की वो चाहत,
उस मोड़ से आइ वो बेरूख हवा,
बता गई मुझे वो तुम्हारा पता,
मिल गया इसी धूल में वो उसे था पता,
उस खुले आसमा पर हमने ठहराई नज़र,
इसी आस में शायद तुम आओगे नज़र,
वक़्त का पहिया अगर घूमा नही होता,
ये काया पलट फिर हुआ नही होता.
और आज हमने तुम्हे पा लिया होता,
अगर मिलन नसीब में लिखा नही होता,
तो थोड़ा सा वक़्त और हमें मिल गया होता,
कम से कम एक नज़र भर तुम्हें देख तो लिया होता....